तन्मे मनः शिव संकल्प मस्तु

*तन्मे मनः शिव संकल्प मस्तु* 
*==================*

*रामकृष्ण परमहंस कहा करते थे-सब कुछ मन की लीला से है। मन से ही मनुष्य बद्ध है और मन से ही मुक्त। मन पर जैसा रंग चढ़ाओगे, उसी रंग में रंग जायेगा। एक ही मन विभिन्न भावों से विभिन्न व्यक्तियों से भिन्न-भिन्न तरह का प्यार करता है। एक स्त्री को एक भाव से तथा सन्तान को वह दूसरे भाव से स्नेह करता है। ईश्वर प्रेम में मन के भावों का स्वरूप सर्वथा बदल जाता है।”महर्षि रमण के अनुसार "सुख और दुःख मन के पहलू हैं। मनुष्य मन और शरीर को ही यथार्थ समझता है तथा अपने सत्यानन्द स्वरूप आत्मा को भूल गया है जिसके कारण ही विविध प्रकार के दुःखों की उत्पत्ति होती है। दुःखों से यदि निवृत्ति पानी है तो मन की लीलाओं को जानने तथा उससे पार जाने का प्रयत्न करना चाहिए।"मन का स्थूल रूप मानवी मस्तिष्क है जो बाह्य जगत से इन्द्रियों तथा असंख्य संवेदनशील नाड़ियों द्वारा जुड़ा रहता है। उनके माध्यम से सूचनाएँ एकत्रित करता है। टेलीविजन यन्त्र की भाँति मस्तिष्क रूपी इलेक्ट्रानिक यन्त्र में घटनाओं, दृश्यों के चित्र-चित्रित होते रहते हैं। मन की स्थूल परत ही अभिव्यक्त होती है तथा साँसारिक कार्यों में उसकी सामर्थ्य का ही प्रयोग हो पाता है। जबकि अति सामर्थ्यवान अति मानस प्रसुप्त पड़ा रहता है। उसको जागृत करना ही परम पुरुषार्थ है। ऋतम्भरा प्रज्ञा सम्पन्न राम, कृष्ण, बुद्ध, ईसा, शंकराचार्य, रामकृष्ण, महर्षि रमण जैसी प्रतिभाएँ उस महान जागरण की ही परिणति हैं। उनकी ये विशेषताएँ कहीं बाहर से आसमान से नहीं टपकी, वरन् मन की सूक्ष्म परतों के जागरण के फलस्वरूप प्रकट हुई।भौतिक संसार में मानसिक शक्ति की अभिव्यक्ति किसी में शौर्य के रूप में प्रकट होती है, किसी में कला के रूप में तो किसी में प्रतिभा के रूप में। किसी-किसी में वह शक्ति पशुता के रूप में भी अपना परिचय देती है। पर कुछ ऐसे भी महामानव होते हैं जो उस शक्ति की अन्तिम अवस्था को प्राप्त कर प्रकृति के बन्धनों से सर्वदा के लिए मुक्त हो जाते हैं।रामकृष्ण परमहँस ने उसी महाशक्ति को काली अथवा महामाया के नाम से सम्बोधित किया है। शक्ति पूजा भी प्रकारान्तर से उस महाशक्ति की अभ्यर्थना का ही रूप है। उनका कहना था कि किसी ने प्रकृति को- माया को भोग विलास की वस्तु मान लिया तो वह मृग मरीचिका की भाँति उसके पीछे भागता फिरेगा तथा असन्तुष्टि तथा अतृप्ति की आग में जलता रहेगा। रावण तथा दुर्योधन जैसे प्रतापी राजाओं को भी उस आग में जल कर राख हो जाना पड़ा।उस शक्ति का सम्बन्ध जब राज सत्ता वैभव एवं शौर्य से जुड़ जाता है तो व्यक्ति नैपोलियन, हिटलर, सिकन्दर, अर्जुन तथा कर्ण जैसे महाबली बन जाते हैं। वही शक्ति जब प्रज्ञा के रूप में अभिव्यक्त होती है तो शंकराचार्य, विवेकानन्द, कुमारिल, अरस्तू और कान्ट जैसे विद्वान प्रकट होते हैं। जिसने उस प्रकृति को विज्ञान के रूप में परब्रह्म की शक्ति मान लिया तो वह न्यूटन और आइन्स्टीन हो गया और जिसने प्रस्तर की प्रतिमा को ही काली मान लिया, वह रामकृष्ण परमहंस हो गया। जिसने उस प्रकृति को आदर्श व्यवस्था मान लिया वह मर्यादा पुरुषोत्तम राम बन गया। जिसका उस प्रकृति से संयोग हो गया वह, योगीराज कृष्ण हो गया।ज्ञान का स्रोत वस्तुतः मनुष्य का मन है। कोई भी ज्ञान बाहर से नहीं आता, सब कुछ अन्दर ही है। आविष्कार का अर्थ- मनुष्य का अपनी अनन्त शक्ति स्वरूपा आत्मा पर आच्छन्न आवरण हटा लेना। संसार भर में ज्ञान के क्षेत्र में जो कुछ भी विद्यमान है वह मन से ही निकला है।*

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ